Holika Dahan Katha
होलिका दहन कथा
About Holika Dahan Katha
Holika Dahan Katha (होलिका दहन कथा) is a sacred prayer dedicated to Lord Vishnu. This revered text originates from the Bhagavata Purana. Reciting this katha with devotion inspires unshakeable faith like Prahlad, invokes Narasimha's fierce protection, and symbolizes the triumph of good over evil. Recitation is particularly auspicious during Holi and Holika Dahan. Comprising 15 verses, it can be completed in approximately 12 minutes, making it ideal for festival day worship. On this page, you can read the complete Holika Dahan Katha in Devanagari Sanskrit with English transliteration, Hindi meaning (arth), and free PDF download for offline recitation.
Reviewed & translated by Acharya Pushyadant Mishra
Stotra Path (स्तोत्र पाठ)
॥ श्री होलिका दहन कथा ॥
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।
॥ कथा ॥
सतयुग में हिरण्यकशिपु नाम का एक अत्यन्त बलशाली दैत्यराज था। उसने ब्रह्माजी की कठोर तपस्या करके यह वरदान प्राप्त किया था कि न उसे कोई देवता मार सके, न मनुष्य, न पशु; न दिन में मरे, न रात में; न भीतर, न बाहर; न अस्त्र से, न शस्त्र से; न भूमि पर, न आकाश में। इस वरदान के घमंड में वह स्वयं को भगवान मानने लगा।
हिरण्यकशिपु ने सम्पूर्ण तीनों लोकों में आदेश दिया कि कोई भी विष्णु की पूजा नहीं करेगा — सब केवल उसी की पूजा करेंगे। देवता, ऋषि-मुनि सब भयभीत हो गए।
किन्तु उसी हिरण्यकशिपु का पुत्र प्रह्लाद भगवान विष्णु का परम भक्त था। प्रह्लाद बचपन से ही "ॐ नमो नारायणाय" का जाप करता था। गुरु शुक्राचार्य के पुत्र षण्ड और अमर्क ने बहुत प्रयत्न किया कि प्रह्लाद विष्णु भक्ति छोड़ दे, किन्तु प्रह्लाद ने कहा — "मेरे प्रभु विष्णु सर्वव्यापी हैं, वे सब जगह हैं।"
हिरण्यकशिपु क्रोध से पागल हो गया। उसने प्रह्लाद को मारने के अनेक उपाय किए — उसे विष दिया, साँपों से डसवाया, पहाड़ से गिरवाया, हाथियों से कुचलवाया, समुद्र में फिंकवाया — किन्तु हर बार भगवान विष्णु ने अपने भक्त की रक्षा की और प्रह्लाद को कुछ भी नहीं हुआ।
अन्त में हिरण्यकशिपु ने अपनी बहन होलिका को बुलाया। होलिका को ब्रह्माजी से एक विशेष वरदान प्राप्त था — उसके पास एक दिव्य चादर थी जिसे ओढ़कर अग्नि में बैठने पर अग्नि उसे जला नहीं सकती थी। किन्तु यह वरदान केवल तभी काम करता था जब होलिका अकेली अग्नि में प्रवेश करे।
हिरण्यकशिपु ने कहा — "बहन! तू इस बालक को गोद में लेकर अग्नि में बैठ जा। तू तो बच जाएगी और यह जलकर भस्म हो जाएगा।"
होलिका ने प्रह्लाद को अपनी गोद में बिठाया और विशाल अग्निकुण्ड में बैठ गई। प्रह्लाद भयभीत नहीं हुआ। उसने आँखें बन्द कीं और भगवान विष्णु का स्मरण किया — "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।"
तभी एक अद्भुत चमत्कार हुआ। प्रचण्ड वायु चली और होलिका की दिव्य चादर उड़कर प्रह्लाद के ऊपर आ गई। होलिका अग्नि में जलने लगी क्योंकि उसका वरदान अकेले बैठने पर ही काम करता था। होलिका अग्नि में भस्म हो गई और प्रह्लाद बिल्कुल सुरक्षित बाहर आ गया।
इसके बाद भगवान विष्णु ने नरसिंह अवतार लेकर — आधा नर, आधा सिंह रूप में — सन्ध्या के समय, द्वार की देहली पर, अपनी गोद में रखकर, अपने नखों से हिरण्यकशिपु का वध किया। इस प्रकार ब्रह्मा के वरदान की सभी शर्तें पूरी हुईं।
तभी से होलिका दहन का उत्सव मनाया जाता है। फाल्गुन पूर्णिमा की सन्ध्या को होलिका जलाई जाती है जो बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक है। अगले दिन रंगों से होली खेली जाती है।
॥ व्रत विधि ॥
फाल्गुन पूर्णिमा को होलिका दहन स्थल पर गोबर के उपलों और लकड़ियों से होलिका सजाएँ।
नई फसल — गेहूँ की बालियाँ, चने — अग्नि में भूनें।
होलिका की परिक्रमा करें और जल, रोली, अक्षत चढ़ाएँ।
कथा श्रवण करें और प्रह्लाद की भक्ति का स्मरण करें।
॥ मन्त्र ॥
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।
ॐ नरसिंहाय नमः।
॥ इति श्री होलिका दहन कथा सम्पूर्ण ॥
Benefits (फल)
- ★Inspires unshakeable devotion to Lord Vishnu like Prahlad
- ★Symbolizes triumph of good over evil — burns away negativity
- ★Invokes Narasimha's fierce protection against all dangers
- ★Removes fear and instills courage in the devotee
- ★Holika Dahan ritual purifies the atmosphere and the soul
