Chhath Puja Vrat Katha
छठ पूजा व्रत कथा
About Chhath Puja Vrat Katha
Chhath Puja Vrat Katha (छठ पूजा व्रत कथा) is a sacred prayer dedicated to Lord Surya and Chhathi Maiya (Shashthi Devi). Attributed to Padma Purana, this prayer narrates how King Priyavrat's dead son was revived by Chhathi Maiya's grace. The four-day vrat of Nahay-Khay, Kharna, Sandhya Arghya and Usha Arghya is one of the most rigorous in Hindu tradition. Devotees recite this katha for children's welfare, health, vitality and prosperity. Recitation is particularly auspicious during Chhath Puja (Kartik Shukla Shashthi). With a reading time of about 15 minutes, this prayer is essential for the annual Chhath celebration. On this page, you can read the complete Chhath Puja Vrat Katha in Devanagari Hindi with English transliteration, Hindi meaning (arth), and free PDF download for offline recitation.
Reviewed & translated by Acharya Pushyadant Mishra
Stotra Path (स्तोत्र पाठ)
॥ श्री छठ पूजा व्रत कथा ॥
ॐ सूर्याय नमः। ॐ छठी मैया नमः।
॥ माहात्म्य ॥
कार्तिक शुक्ल षष्ठी को छठ पूजा का महापर्व मनाया जाता है। यह चार दिन का कठोर व्रत है — नहाय-खाय, खरना, सन्ध्या अर्घ्य और उषा अर्घ्य। इसमें भगवान सूर्य और छठी मैया (षष्ठी देवी) की पूजा की जाती है। छठी मैया को देवसेना (कार्तिकेय की पत्नी) और उषा (प्रातःकालीन किरण) दोनों रूपों में पूजा जाता है। यह व्रत सन्तान प्राप्ति, सन्तान की दीर्घायु, स्वास्थ्य और समृद्धि के लिए किया जाता है।
॥ कथा — राजा प्रियव्रत की कथा ॥
प्राचीन काल में प्रियव्रत नाम के एक प्रतापी राजा थे। उनकी रानी मालिनी अत्यन्त सुशील और धर्मपरायण थीं। दोनों बहुत सुखी थे किन्तु उनकी कोई सन्तान नहीं थी। राज्य में उत्तराधिकारी न होने से राजा बहुत चिन्तित रहते थे।
राजा ने महर्षि कश्यप को बुलवाया और कहा — "हे गुरुदेव! हमें सन्तान प्राप्ति का कोई उपाय बताइए।" महर्षि कश्यप ने पुत्रेष्टि यज्ञ कराने की सलाह दी।
विधिपूर्वक यज्ञ सम्पन्न हुआ। यज्ञ की अग्नि से एक दिव्य खीर प्राप्त हुई। रानी मालिनी ने वह खीर ग्रहण की। कालान्तर में रानी गर्भवती हुईं।
नौ मास पूर्ण होने पर एक पुत्र का जन्म हुआ, किन्तु बालक मरा हुआ पैदा हुआ। राजा और रानी का विलाप सुनकर पूरे राज्य में शोक छा गया।
राजा प्रियव्रत दुःख से विक्षिप्त हो गए। वे मृत बालक को गोद में लेकर श्मशान की ओर चल पड़े। वे सोच रहे थे कि बालक का अन्तिम संस्कार करके स्वयं भी प्राण त्याग दें।
श्मशान भूमि पर जब राजा विलाप कर रहे थे, तभी आकाश से एक दिव्य ज्योति प्रकट हुई। उस ज्योति में से छठी मैया (देवसेना — कार्तिकेय की पत्नी, षष्ठी देवी) प्रकट हुईं।
छठी मैया बोलीं — "हे राजन्! मैं षष्ठी देवी हूँ। मैं ब्रह्मा की मानसपुत्री हूँ। मैं सन्तान की रक्षिका हूँ। जो कोई मेरी पूजा सच्चे मन से करता है, उसे सन्तान का सुख अवश्य मिलता है।"
राजा प्रियव्रत ने हाथ जोड़कर कहा — "हे माता! कृपया मेरे पुत्र को जीवनदान दीजिए।"
छठी मैया ने मृत बालक को स्पर्श किया। बालक के शरीर में प्राण लौट आए। वह रोने लगा। राजा की खुशी का ठिकाना नहीं रहा।
छठी मैया बोलीं — "हे राजन्! कार्तिक शुक्ल षष्ठी को मेरी पूजा करो। सूर्य भगवान को अर्घ्य दो — सन्ध्या के डूबते सूर्य को और प्रातः के उगते सूर्य को। नदी या तालाब के किनारे खड़े होकर सूप में प्रसाद रखकर अर्घ्य दो। चार दिन का कठोर व्रत करो — पहले दिन नहाय-खाय, दूसरे दिन खरना, तीसरे दिन सन्ध्या अर्घ्य और चौथे दिन उषा अर्घ्य। जो कोई ऐसा करेगा उसकी सन्तान सदा सुखी और दीर्घायु होगी।"
राजा प्रियव्रत ने पूरे राज्य में छठ पूजा का आयोजन कराया। उसके बाद उनका पुत्र स्वस्थ, बलवान और दीर्घायु हुआ। राज्य में सुख-समृद्धि छा गई।
तभी से भारत में — विशेषकर बिहार, झारखण्ड, पूर्वी उत्तर प्रदेश और नेपाल में — छठ पूजा का महापर्व कार्तिक शुक्ल षष्ठी को बड़ी श्रद्धा और कठोर नियमों से मनाया जाता है।
॥ व्रत विधि (चार दिन) ॥
पहला दिन — नहाय-खाय: स्नान करके शुद्ध सात्विक भोजन करें। कद्दू-दाल-चावल का भोग।
दूसरा दिन — खरना: दिनभर निर्जला व्रत रखें। सन्ध्या में गुड़ की खीर बनाकर छठी मैया को भोग लगाएँ। प्रसाद खाकर अगले दिन से निर्जला रहें।
तीसरा दिन — सन्ध्या अर्घ्य: सन्ध्या काल में नदी-तालाब के घाट पर जाएँ। सूप (बाँस की टोकरी) में ठेकुआ, फल, गन्ना रखकर डूबते सूर्य को अर्घ्य दें।
चौथा दिन — उषा अर्घ्य: प्रातःकाल उगते सूर्य को अर्घ्य दें। व्रत पारण करें।
॥ इति श्री छठ पूजा व्रत कथा सम्पूर्णा ॥
Benefits (फल)
- ★Greatest Sun worship festival — four days of rigorous fasting and devotion
- ★Chhathi Maiya grants children, their long life, health and prosperity
- ★Arghya to setting and rising sun purifies body, mind and soul
- ★One of the most sacred and disciplined vrats in Hindu tradition
- ★Particularly powerful for couples seeking children (santan prapti)
- ★Celebrated with immense devotion in Bihar, Jharkhand and Eastern UP
