Ahoi Ashtami Vrat Katha
अहोई अष्टमी व्रत कथा
About Ahoi Ashtami Vrat Katha
Ahoi Ashtami Vrat Katha (अहोई अष्टमी व्रत कथा) is a sacred prayer dedicated to Goddess Parvati (as Ahoi Mata). Attributed to Traditional Folk Katha, this prayer is observed by mothers for the long life, health and welfare of their children. The katha narrates how a mother accidentally killed a baby porcupine and lost all seven sons, but regained them through sincere observance of Ahoi Ashtami vrat. Recitation is particularly auspicious eight days before Diwali (Kartik Krishna Ashtami). With a reading time of about 10 minutes, this prayer is a must for every devoted mother. On this page, you can read the complete Ahoi Ashtami Vrat Katha in Devanagari Hindi with English transliteration, Hindi meaning (arth), and free PDF download for offline recitation.
Reviewed & translated by Acharya Pushyadant Mishra
Stotra Path (स्तोत्र पाठ)
॥ श्री अहोई अष्टमी व्रत कथा ॥
ॐ अहोई माता देव्यै नमः।
॥ माहात्म्य ॥
कार्तिक कृष्ण अष्टमी को अहोई अष्टमी का व्रत किया जाता है। यह दीपावली से आठ दिन पहले आता है। माताएँ अपनी सन्तान की लम्बी आयु, सुख और कल्याण के लिए यह व्रत रखती हैं। इस दिन अहोई माता की पूजा की जाती है।
॥ कथा ॥
प्राचीन काल में एक गाँव में एक स्त्री रहती थी। उसके सात बेटे थे। दीपावली से पहले गाँव की सभी स्त्रियाँ अपने-अपने घरों को लीपने-पोतने के लिए जंगल से मिट्टी लाती थीं।
वह स्त्री भी जंगल में मिट्टी खोदने गई। जिस स्थान पर वह मिट्टी खोद रही थी, वहाँ एक साही (सेही/काँटेवाला जानवर) का बिल था। खुरपी चलाते समय उसकी खुरपी से साही का एक छोटा बच्चा मर गया।
स्त्री को बहुत दुःख हुआ किन्तु वह चुपचाप मिट्टी लेकर घर लौट आई।
कुछ दिनों बाद उसका एक बेटा बीमार हुआ और मर गया। फिर दूसरा बेटा मरा, फिर तीसरा। एक-एक करके उसके सातों बेटे मृत्यु को प्राप्त हो गए।
स्त्री का रो-रोकर बुरा हाल हो गया। उसने गाँव की बुजुर्ग अम्मा को सब बताया। बुजुर्ग अम्मा बोलीं — "बेटी! तूने जाने-अनजाने में साही के बच्चे की हत्या की है। उसकी माँ ने तुझे श्राप दिया है। तू अहोई अष्टमी का व्रत कर और साही माता से क्षमा माँग।"
स्त्री ने कार्तिक कृष्ण अष्टमी को निर्जला व्रत रखा। उसने अहोई माता का चित्र दीवार पर बनाया — जिसमें साही और उसके बच्चे थे। उसने सच्चे मन से पूजा की, दीपक जलाया और तारों को अर्घ्य दिया।
स्त्री ने रोते हुए कहा — "हे अहोई माता! मुझसे अनजाने में पाप हो गया। मैंने जान-बूझकर नहीं किया। कृपा करके मेरी सन्तान को लौटा दीजिए।"
अहोई माता उसकी सच्ची भक्ति और पश्चाताप से प्रसन्न हुईं। उन्होंने साही माता के श्राप को शान्त किया और स्त्री के सातों पुत्रों को पुनर्जीवित कर दिया।
स्त्री के सातों बेटे जीवित होकर घर लौट आए। गाँव भर में आनन्द छा गया। तभी से माताएँ प्रत्येक वर्ष कार्तिक कृष्ण अष्टमी को अहोई अष्टमी का व्रत रखती हैं और अपनी सन्तान की दीर्घायु और कल्याण की कामना करती हैं।
जो माता सच्चे मन से यह व्रत करती है, अहोई माता उसकी सन्तान की रक्षा सदैव करती हैं।
॥ व्रत विधि ॥
कार्तिक कृष्ण अष्टमी (दीपावली से आठ दिन पूर्व) को व्रत रखें।
दीवार पर अहोई माता और साही का चित्र बनाएँ।
सायंकाल तारों को अर्घ्य दें।
कथा सुनें और प्रसाद बाँटें।
तारों के दर्शन के बाद भोजन करें।
॥ इति श्री अहोई अष्टमी व्रत कथा सम्पूर्णा ॥
Benefits (फल)
- ★Mothers observe this vrat for the long life and welfare of their children
- ★Celebrated 8 days before Diwali (Kartik Krishna Ashtami)
- ★Ahoi Mata protects children from illness and misfortune
- ★Powerful vrat for those praying for the safety of their sons and daughters
- ★Listening to the katha with devotion is integral to the vrat
- ★One of the most important motherly vrats in Hindu tradition
