Dev Uthani Ekadashi Katha
देवउठनी एकादशी कथा
About Dev Uthani Ekadashi Katha
Dev Uthani Ekadashi Katha (देवउठनी एकादशी कथा) is a sacred prayer dedicated to Lord Vishnu. This revered text originates from the Padma Purana. Reciting this katha with devotion marks the end of Chaturmas, destroys sins, grants Vaikuntha, and blesses with marital happiness through Tulsi Vivah. Recitation is particularly auspicious during Devuthani Ekadashi and Tulsi Vivah. Comprising 15 verses, it can be completed in approximately 12 minutes, making it ideal for festival day worship. On this page, you can read the complete Dev Uthani Ekadashi Katha in Devanagari Sanskrit with English transliteration, Hindi meaning (arth), and free PDF download for offline recitation.
Reviewed & translated by Acharya Pushyadant Mishra
Stotra Path (स्तोत्र पाठ)
॥ श्री देवउठनी एकादशी कथा ॥
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।
॥ कथा ॥
बहुत प्राचीन काल की बात है। आषाढ़ मास शुक्ल पक्ष की एकादशी को भगवान विष्णु क्षीरसागर में शेषनाग की शय्या पर योगनिद्रा में चले जाते हैं। इसे देवशयनी एकादशी कहते हैं। जब भगवान सो जाते हैं तो चार मास तक — आषाढ़, श्रावण, भाद्रपद और आश्विन — यह अवधि चातुर्मास कहलाती है।
चातुर्मास में सब शुभ कार्य रुक जाते हैं — विवाह नहीं होते, गृहप्रवेश नहीं होता, नये व्यापार का शुभारम्भ नहीं होता। सन्त-महात्मा एक स्थान पर रुककर तप और साधना करते हैं। भक्तजन व्रत, जप और दान-पुण्य में लगे रहते हैं।
कार्तिक मास शुक्ल पक्ष की एकादशी को भगवान विष्णु योगनिद्रा से जागते हैं। इसे देवउठनी एकादशी या प्रबोधिनी एकादशी कहते हैं। इस दिन माता लक्ष्मी भगवान विष्णु की आरती करती हैं, तुलसी विवाह का उत्सव मनाया जाता है और संसार में पुनः शुभ कार्यों का आरम्भ होता है।
इस एकादशी के विषय में एक प्रसिद्ध कथा है —
एक नगर में एक धर्मात्मा व्यापारी रहता था। वह भगवान विष्णु का अनन्य भक्त था। वह प्रत्येक एकादशी को विधिपूर्वक व्रत रखता था, किन्तु देवशयनी और देवउठनी — इन दोनों एकादशियों का वह विशेष रूप से पालन करता था।
देवशयनी एकादशी पर वह भगवान विष्णु की विशेष पूजा करता, उन्हें शयन कराता और चातुर्मास के चार महीने अत्यन्त संयम, भक्ति और सेवा में बिताता। वह प्रतिदिन तुलसी की सेवा करता, गरीबों को भोजन कराता, विष्णु सहस्रनाम का पाठ करता और ब्रह्मचर्य का पालन करता।
जब कार्तिक शुक्ल एकादशी आती तो वह बड़े उत्साह से भगवान विष्णु को जगाता। रात्रि में जागरण करता, भजन-कीर्तन करता, ढोल-मृदंग बजवाता और प्रातःकाल भगवान के समक्ष आरती करता। तुलसी विवाह का आयोजन करता, ब्राह्मणों को दान देता और पूरे नगर में प्रसाद बँटवाता।
कई वर्षों तक उसने यह क्रम जारी रखा। एक बार वह व्यापारी बहुत बीमार पड़ गया। सबको लगा कि अब वह बचेगा नहीं। किन्तु उस दिन देवउठनी एकादशी थी। व्यापारी ने कमज़ोर अवस्था में भी व्रत रखा, भगवान का स्मरण किया और तुलसी दल अर्पित किया।
रात्रि में भगवान विष्णु ने उसे स्वप्न में दर्शन दिए और कहा — "हे भक्त! तुमने जीवनभर मेरी एकादशियों का पालन किया, विशेषकर देवशयनी और देवउठनी एकादशी का। तुम्हारे सब पाप नष्ट हो गए हैं। तुम्हें इस जन्म में सुख-समृद्धि मिलेगी और अन्त में वैकुण्ठ धाम की प्राप्ति होगी।"
व्यापारी स्वस्थ हो गया। उसकी कीर्ति दूर-दूर तक फैली। उसके व्यापार में अपार वृद्धि हुई। सन्तान, धन, यश — सब कुछ मिला। जीवन के अन्त में उसे विष्णुदूत वैकुण्ठ ले गए।
तभी से देवउठनी एकादशी का व्रत अत्यन्त महत्वपूर्ण माना जाता है। यह एकादशी चातुर्मास का समापन करती है और संसार में शुभता का पुनः आगमन होता है।
॥ व्रत विधि ॥
कार्तिक शुक्ल एकादशी को प्रातःकाल स्नान करके भगवान विष्णु की पूजा करें।
तुलसी और शालिग्राम का विवाह कराएँ।
विष्णु सहस्रनाम या विष्णु स्तुति का पाठ करें।
रात्रि जागरण करें — भजन-कीर्तन करें।
द्वादशी को ब्राह्मणों को भोजन और दान दें।
कथा श्रवण करें।
॥ मन्त्र ॥
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।
उत्तिष्ठ गोविन्द त्यज निद्रां जगत्पते।
त्वयि सुप्ते जगन्नाथ जगत् सुप्तं भवेदिदम्।
उत्तिष्ठोत्तिष्ठ गोविन्द उत्तिष्ठ गरुडध्वज।
उत्तिष्ठ कमलाकान्त त्रैलोक्यं मंगलं कुरु॥
॥ इति श्री देवउठनी एकादशी कथा सम्पूर्ण ॥
Benefits (फल)
- ★Marks the end of Chaturmas — all auspicious activities resume
- ★Observing this Ekadashi destroys sins and grants Vaikuntha
- ★Tulsi Vivah on this day blesses devotees with marital happiness
- ★Vishnu awakens from Yoga Nidra — his blessings are most potent
- ★Begins the Hindu wedding season and griha pravesh period
