Shree Dhanvantari — the physician of the gods and father of AyurvedaShree Dhanvantari

Dhanteras Katha

धनतेरस कथा

12 min read20 versesSource: Samudra Manthan - Puranic Tradition

About Dhanteras Katha

Dhanteras Katha (धनतेरस कथा) is a sacred prayer dedicated to Bhagavan Dhanvantari. This revered text originates from the Samudra Manthan episode in Puranic tradition. It narrates how Lord Dhanvantari emerged from the ocean churning with the pot of Amrit on Kartik Krishna Trayodashi, and how a devoted wife saved her husband from Yama by lighting diyas and piling gold at the door. Chanting this katha with devotion grants health, longevity, wealth, and protection from untimely death. Recitation is particularly auspicious during Dhanteras and Diwali. Comprising 20 verses with a reading time of about 12 minutes, this katha is essential for Dhanteras observance. On this page, you can read the complete Dhanteras Katha in Devanagari Sanskrit with English transliteration, Hindi meaning (arth), and free PDF download for offline recitation.

Reviewed & translated by Acharya Pushyadant Mishra

Stotra Path (स्तोत्र पाठ)

॥ श्री धनतेरस कथा ॥

ॐ नमो भगवते धन्वन्तरये।

॥ धनतेरस माहात्म्य ॥

कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी को धनतेरस का पावन पर्व मनाया जाता है। इस दिन भगवान धन्वन्तरि समुद्र मन्थन से अमृत कलश लेकर प्रकट हुए थे। धनतेरस को धन-सम्पत्ति की पूजा, नये बर्तन और स्वर्ण-रजत की खरीदारी का विशेष महत्त्व है। इस दिन दीपदान करने से अकाल मृत्यु का भय दूर होता है।

॥ प्रथम कथा — समुद्र मन्थन और भगवान धन्वन्तरि ॥

बहुत प्राचीन काल में देवताओं और दानवों के बीच अमृत प्राप्ति के लिये समुद्र मन्थन हुआ। मन्दराचल पर्वत को मथनी और वासुकि नाग को रस्सी बनाकर क्षीरसागर का मन्थन किया गया। भगवान विष्णु ने कूर्म (कछुए) का अवतार लेकर मन्दराचल को अपनी पीठ पर धारण किया।

समुद्र मन्थन से अनेक दिव्य रत्न प्रकट हुए — कामधेनु, ऐरावत हाथी, उच्चैःश्रवा अश्व, कल्पवृक्ष, माँ लक्ष्मी, चन्द्रमा और भयंकर हालाहल विष। हालाहल विष को भगवान शिव ने पीकर सबकी रक्षा की — तभी से उनका नाम नीलकण्ठ पड़ा।

सबसे अन्त में कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी को एक दिव्य पुरुष प्रकट हुए। उनके हाथ में अमृत से भरा स्वर्ण कलश था। उनका शरीर तेजस्वी, वस्त्र पीताम्बर, कण्ठ में माला और मुख पर दिव्य मुस्कान थी। वे साक्षात् भगवान धन्वन्तरि थे — देवताओं के वैद्य, आयुर्वेद के जनक।

देवताओं ने भगवान धन्वन्तरि की पूजा की। अमृत के कलश से देवताओं को अमरत्व प्राप्त हुआ। तभी से कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी को धनतेरस के रूप में मनाया जाता है।

आयुर्वेद में भगवान धन्वन्तरि को आदि वैद्य माना जाता है। उन्होंने मनुष्यों को रोगमुक्ति और दीर्घायु का ज्ञान दिया। धनतेरस पर उनकी पूजा से स्वास्थ्य, दीर्घायु और रोगमुक्ति प्राप्त होती है।

॥ द्वितीय कथा — राजा हिम के पुत्र की कथा ॥

प्राचीन काल में राजा हिम के पुत्र की कुण्डली में लिखा था कि विवाह के चौथे दिन सर्पदंश से उसकी मृत्यु होगी। राजा और रानी अत्यन्त चिन्तित थे, किन्तु कुण्डली का विधान टाला नहीं जा सकता था।

राजकुमार का विवाह हुआ। उसकी नवविवाहिता पत्नी अत्यन्त बुद्धिमान और पतिव्रता थी। जब उसे पता चला कि चौथे दिन यमराज सर्प के रूप में आयेंगे, तो उसने एक उपाय सोचा।

चौथे दिन की रात्रि को उस पतिव्रता स्त्री ने कक्ष के द्वार पर सोने-चाँदी के सिक्कों, आभूषणों और बर्तनों का विशाल ढेर लगा दिया। ढेर इतना ऊँचा था कि द्वार पूरी तरह ढक गया। फिर उसने पूरे कक्ष में, गलियारों में, प्रत्येक कोने में असंख्य दीपक जलाये। इतने दीपक कि रात्रि में दिन जैसा उजाला हो गया।

फिर उसने अपने पति के पास बैठकर कथाएँ सुनानी आरम्भ कीं — देवताओं की कथा, धर्म की कथा, पूर्वजों की गाथा। बीच-बीच में मधुर गीत गाये। पति को क्षण भर भी सोने नहीं दिया।

मध्यरात्रि में यमराज सर्प का रूप धारण करके आये। किन्तु द्वार पर सोने-चाँदी का ढेर इतना विशाल था कि सर्प अन्दर प्रवेश नहीं कर सका। हजारों दीपकों का तीव्र प्रकाश सर्प की आँखों में चुभ गया — वह कुछ देख नहीं पा रहा था।

यमराज सर्प बनकर उस सोने-चाँदी के ढेर पर कुण्डली मारकर बैठ गये। पतिव्रता स्त्री के मधुर भजन और कथाएँ सुनते रहे। सारी रात बीत गई। प्रभात का सूर्य उदित हुआ — और यमराज बिना राजकुमार के प्राण हरे चुपचाप लौट गये।

इस प्रकार उस बुद्धिमान पत्नी ने दीपक के प्रकाश, धन के ढेर और रात्रि जागरण से अपने पति को मृत्यु से बचा लिया।

तभी से धनतेरस पर दीपदान, सोने-चाँदी-बर्तनों की खरीदारी और रात्रि में दीपक जलाने की परम्परा चली आ रही है। यह अकाल मृत्यु से रक्षा और धन-सम्पत्ति की वृद्धि का पर्व है।

॥ धनतेरस पूजा विधि ॥

कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी को सायंकाल स्नान करें।

घर के मुख्य द्वार पर दीपक जलायें।

भगवान धन्वन्तरि की पूजा करें — स्वास्थ्य और दीर्घायु के लिये।

माँ लक्ष्मी और कुबेर की पूजा करें — धन-सम्पत्ति के लिये।

नये बर्तन, स्वर्ण या रजत खरीदें — शुभ माना जाता है।

सन्ध्या में दक्षिण दिशा की ओर (यमराज की दिशा) एक दीपक जलायें — अकाल मृत्यु निवारण हेतु।

धनतेरस कथा का श्रवण करें।

॥ मन्त्र ॥

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय धन्वन्तरये अमृतकलशहस्ताय सर्वामयविनाशनाय त्रैलोक्यनाथाय श्री महाविष्णवे नमः।

ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं महालक्ष्म्यै नमः।

॥ इति श्री धनतेरस कथा सम्पूर्ण ॥

Benefits (फल)

  • Complete Dhanteras katha with Samudra Manthan and Raja Hima stories
  • Invokes Bhagavan Dhanvantari's blessings for health, longevity, and freedom from disease
  • Worship of Lakshmi and Kubera on Dhanteras brings wealth and prosperity
  • Lighting diyas and buying gold/silver on this day wards off untimely death
  • Essential reading for Dhanteras and Diwali festival observance
  • Includes Dhanvantari and Lakshmi mantras for health and wealth

Frequently Asked Questions

Common questions about Dhanteras Katha

Read Dhanteras Katha in Hindi with Samudra Manthan and Raja Hima stories. Complete katha for health, wealth, and protection from untimely death. It is dedicated to Shree Dhanvantari (श्री धन्वन्तरि), the physician of the gods and father of ayurveda. emerged during the churning of the ocean with the pot of amrit. This sacred hymn contains 20 verses and is sourced from Samudra Manthan - Puranic Tradition.