Hartalika Teej Vrat Katha
हरतालिका तीज व्रत कथा
About Hartalika Teej Vrat Katha
Hartalika Teej Vrat Katha (हरतालिका तीज व्रत कथा) is a sacred prayer dedicated to Goddess Parvati and Lord Shiva. Attributed to Shiva Purana, this prayer narrates how Parvati's friend hid her in a forest so she could perform tapas for Shiva instead of marrying Vishnu. Devotees recite this katha for husband's long life, marital bliss, and saubhagya. Unmarried girls observe it for an ideal husband. Recitation is particularly auspicious during Hartalika Teej (Bhadrapada Shukla Tritiya) and Navratri. With a reading time of about 12 minutes, this prayer is ideal for the annual Teej celebration. On this page, you can read the complete Hartalika Teej Vrat Katha in Devanagari Hindi with English transliteration, Hindi meaning (arth), and free PDF download for offline recitation.
Reviewed & translated by Acharya Pushyadant Mishra
Stotra Path (स्तोत्र पाठ)
॥ श्री हरतालिका तीज व्रत कथा ॥
ॐ नमः शिवाय। ॐ उमायै नमः।
॥ माहात्म्य ॥
भाद्रपद शुक्ल तृतीया को हरतालिका तीज का व्रत किया जाता है। यह व्रत सुहागिन स्त्रियाँ पति की दीर्घायु और सौभाग्य के लिए तथा कुमारी कन्याएँ अच्छे वर की प्राप्ति के लिए रखती हैं। इस व्रत में माता पार्वती और भगवान शिव की पूजा की जाती है।
॥ कथा ॥
बहुत समय पहले की बात है। हिमालय राज की पुत्री पार्वती बाल्यकाल से ही भगवान शिव को पति रूप में पाना चाहती थीं। पार्वती ने मन ही मन शिव को अपना पति मान लिया था।
एक बार नारद मुनि हिमालय राज के दरबार में आए। उन्होंने हिमालय से कहा — "राजन्! तुम्हारी पुत्री के योग में विष्णु भगवान का विवाह लिखा है। भगवान विष्णु स्वयं पार्वती से विवाह करना चाहते हैं।"
हिमालय राज बहुत प्रसन्न हुए और विष्णु भगवान से पार्वती का विवाह निश्चित कर दिया।
जब पार्वती को यह समाचार मिला तो वे बहुत दुःखी हुईं। उन्होंने अपनी सबसे प्रिय सखी को सब बताया और कहा — "मैंने तो शिव को ही पति माना है। यदि मेरा विवाह विष्णु से हुआ तो मैं प्राण त्याग दूँगी।"
सखी ने कहा — "हे सखी! घबराओ नहीं। मैं तुम्हें एक घने वन में ले चलती हूँ जहाँ तुम्हारे पिता तुम्हें ढूँढ नहीं पाएँगे। वहाँ तुम भगवान शिव की तपस्या करना।"
सखी पार्वती को हर कर (छिपाकर) एक घने वन में ले गई। इसीलिए इस व्रत का नाम 'हरतालिका' पड़ा — सखी द्वारा हरण (अपहरण) करने के कारण।
वन में पार्वती ने नदी के तट पर बालू से शिवलिंग बनाया। उन्होंने निर्जला व्रत रखा और रात-दिन शिवलिंग की पूजा की। बिल्वपत्र, फूल और जल चढ़ाया। भाद्रपद शुक्ल तृतीया को उन्होंने रातभर जागकर शिव की आराधना की।
पार्वती की घोर तपस्या से भगवान शिव प्रसन्न हुए। वे स्वयं प्रकट हुए और बोले — "हे पार्वती! मैं तुम्हारी भक्ति से प्रसन्न हूँ। तुम्हारी मनोकामना पूर्ण होगी। मैं तुमसे विवाह करूँगा।"
शिव ने पार्वती को वर दिया और अन्तर्ध्यान हो गए।
इधर हिमालय राज पार्वती को ढूँढते-ढूँढते वन में पहुँचे। पार्वती ने पिता को सब सत्य बताया — "पिताजी, मैंने शिव को ही पति माना है। कृपया मेरा विवाह शिव से ही कराएँ।"
भगवान शिव की कृपा और पार्वती की तपस्या देखकर हिमालय राज ने विष्णु भगवान से क्षमा माँगी और पार्वती का विवाह भगवान शिव से धूमधाम से कराया।
॥ व्रत विधि ॥
भाद्रपद शुक्ल तृतीया को निर्जला व्रत रखें।
बालू या काली मिट्टी से शिव-पार्वती की प्रतिमा बनाएँ।
बिल्वपत्र, फूल, धूप, दीप से पूजा करें।
रात भर जागरण करें और कथा सुनें।
दूसरे दिन प्रतिमा का विसर्जन करें और पारण करें।
॥ इति श्री हरतालिका तीज व्रत कथा सम्पूर्णा ॥
Benefits (फल)
- ★Supreme vrat for married women — ensures husband's long life and saubhagya
- ★Unmarried girls observe this for getting an ideal husband like Shiva
- ★Nirjala (waterless) fast with night-long vigil — highly meritorious
- ★Invokes the blessings of Shiva-Parvati — the divine couple
- ★Celebrated with great devotion across North India in Bhadrapada month
- ★Listening to the katha of Parvati's tapas strengthens marital devotion
