Shree Krishna — the eighth avatar of VishnuShree Krishna

Janmashtami Vrat Katha

जन्माष्टमी व्रत कथा

15 min read24 versesSource: Bhagavata Purana

About Janmashtami Vrat Katha

Janmashtami Vrat Katha (जन्माष्टमी व्रत कथा) is a sacred prayer dedicated to Lord Krishna. This revered text originates from Bhagavata Purana. It narrates the complete story of Krishna's divine birth — Kansa's tyranny, the imprisonment of Devaki and Vasudeva, the miraculous midnight birth, Vasudeva's journey across the flooded Yamuna, and the exchange with Yogamaya. Chanting this katha with devotion grants Krishna's divine protection, spiritual growth, and liberation. Recitation is particularly auspicious during Janmashtami. Comprising 24 verses with a reading time of about 15 minutes, this katha is essential for Janmashtami observance. On this page, you can read the complete Janmashtami Vrat Katha in Devanagari Sanskrit with English transliteration, Hindi meaning (arth), and free PDF download for offline recitation.

Reviewed & translated by Acharya Pushyadant Mishra

Stotra Path (स्तोत्र पाठ)

॥ श्री जन्माष्टमी व्रत कथा ॥

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।

॥ जन्माष्टमी माहात्म्य ॥

भाद्रपद कृष्ण पक्ष अष्टमी को रोहिणी नक्षत्र में मध्यरात्रि के समय भगवान श्रीकृष्ण का जन्म हुआ। इस दिन को जन्माष्टमी के रूप में मनाया जाता है। भक्तजन मध्यरात्रि तक व्रत रखते हैं और कृष्ण जन्मोत्सव मनाते हैं। यह कथा श्रीमद्भागवत पुराण में वर्णित है।

॥ कथा प्रारम्भ — कंस का अत्याचार ॥

द्वापर युग में मथुरा नगरी में उग्रसेन नामक धर्मपरायण राजा राज्य करते थे। उनका पुत्र कंस अत्यन्त क्रूर और अधर्मी था। कंस ने अपने पिता उग्रसेन को बन्दी बनाकर स्वयं मथुरा का राजा बन गया। उसके अत्याचार से प्रजा त्राहि-त्राहि कर रही थी।

कंस की बहन देवकी अत्यन्त सुशील और धर्मपरायण थी। देवकी का विवाह यदुवंशी वसुदेव से हुआ। विवाह के दिन कंस स्वयं रथ हाँककर बहन को ससुराल पहुँचा रहा था।

मार्ग में अचानक आकाशवाणी हुई — "हे कंस! जिस देवकी को तू इतने प्रेम से ले जा रहा है, उसी की आठवीं सन्तान तेरा वध करेगी।"

कंस भयभीत हो गया। उसने तुरन्त तलवार निकालकर देवकी को मारना चाहा। वसुदेव ने हाथ जोड़कर कहा — "हे कंस! देवकी तुम्हारी बहन है। मैं तुम्हें वचन देता हूँ कि हमारी प्रत्येक सन्तान तुम्हें सौंप दूँगा।"

कंस ने देवकी और वसुदेव को कारागार में बन्द कर दिया।

॥ छह सन्तानों का वध ॥

समय बीतता गया। देवकी के एक-एक करके छह पुत्र उत्पन्न हुए। कंस ने निर्दयता से छहों शिशुओं को पत्थर पर पटककर मार डाला। पूरी मथुरा में शोक व्याप्त था। किन्तु देवकी और वसुदेव की भगवान विष्णु में अटल आस्था थी।

सातवीं सन्तान बलराम थे। भगवान की योगमाया ने बलरामजी को देवकी के गर्भ से वसुदेव की दूसरी पत्नी रोहिणी के गर्भ में स्थानान्तरित कर दिया, जो गोकुल में नन्दबाबा के यहाँ रहती थीं। कंस को बताया गया कि गर्भपात हो गया।

॥ भगवान श्रीकृष्ण का दिव्य जन्म ॥

भाद्रपद कृष्ण पक्ष अष्टमी की रात्रि आई। घनघोर वर्षा हो रही थी। बिजली कड़क रही थी। मध्यरात्रि का समय था — रोहिणी नक्षत्र उदित था।

तभी कारागार में दिव्य प्रकाश फैल गया। भगवान विष्णु चतुर्भुज रूप में प्रकट हुए — शंख, चक्र, गदा, पद्म धारण किये, पीताम्बर पहने, मुकुट शोभित, कौस्तुभ मणि चमक रही थी।

देवकी और वसुदेव ने हाथ जोड़कर स्तुति की। भगवान बोले — "हे माता-पिता! पूर्व जन्म में तुमने मेरी तपस्या की थी। मैं तुम्हारे पुत्र रूप में प्रकट हुआ हूँ। अब मुझे शीघ्र गोकुल में नन्दबाबा के यहाँ पहुँचा दो। वहाँ यशोदा के गर्भ से योगमाया ने जन्म लिया है — उसे यहाँ ले आओ।"

यह कहकर भगवान ने शिशु रूप धारण कर लिया।

॥ वसुदेव की यमुना यात्रा ॥

तभी अद्भुत चमत्कार हुआ। कारागार के सभी पहरेदार गहरी निद्रा में सो गये। बन्दीगृह की सभी बेड़ियाँ स्वयं खुल गयीं। भारी लोहे के दरवाजे अपने-आप खुल गये।

वसुदेव ने शिशु कृष्ण को सूप में रखा और सिर पर उठाकर चल पड़े। बाहर मूसलाधार वर्षा हो रही थी। शेषनाग ने अपने फनों का छत्र बनाकर बालक कृष्ण को वर्षा से बचाया।

यमुना नदी पूर्ण उफान पर थी। जल तेजी से बह रहा था। वसुदेव ने साहस करके नदी में कदम रखा। जैसे-जैसे वसुदेव आगे बढ़े, यमुना का जल बढ़ता गया — कमर तक, छाती तक, गले तक। किन्तु जब जल शिशु कृष्ण के चरणों को छू गया — तत्क्षण यमुना ने मार्ग दे दिया। जल दो भागों में विभक्त हो गया।

वसुदेव यमुना पार करके गोकुल पहुँचे। नन्दबाबा के घर यशोदा सो रही थीं। उनके पास एक कन्या (योगमाया) जन्मी थी। वसुदेव ने कृष्ण को यशोदा के पास रख दिया और कन्या को लेकर वापस कारागार में लौट आये।

॥ कंस और योगमाया ॥

प्रातः कंस को सूचना मिली कि देवकी की आठवीं सन्तान उत्पन्न हुई है। कंस दौड़ता हुआ कारागार में आया और शिशु को छीनकर पत्थर पर पटकने लगा। किन्तु वह कन्या (योगमाया) कंस के हाथ से छूटकर आकाश में चली गई और बोली — "हे मूर्ख कंस! तुझे मारने वाला गोकुल में सुरक्षित पहुँच चुका है। तेरा अन्त निश्चित है!"

कंस भयभीत हुआ और उसने गोकुल-वृन्दावन के सभी शिशुओं को मारने का आदेश दिया। किन्तु भगवान कृष्ण सदा सुरक्षित रहे और अन्ततः कंस का वध किया।

॥ व्रत विधि ॥

भाद्रपद कृष्ण अष्टमी को प्रातः स्नान करके व्रत का संकल्प लें।

भगवान कृष्ण की बाल रूप मूर्ति स्थापित करें।

षोडशोपचार पूजा करें — माखन, मिश्री, पंचामृत, तुलसी अर्पित करें।

मध्यरात्रि तक निर्जला या फलाहार व्रत रखें।

मध्यरात्रि में कृष्ण जन्मोत्सव मनायें — शंख बजायें, आरती करें।

झूला सजाकर बालकृष्ण को झुलायें।

कथा श्रवण करें, फिर प्रसाद वितरण कर व्रत खोलें।

॥ मन्त्र ॥

कृष्णाय वासुदेवाय देवकीनन्दनाय च।

नन्दगोपकुमाराय गोविन्दाय नमो नमः॥

वसुदेवसुतं देवं कंसचाणूरमर्दनम्।

देवकीपरमानन्दं कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम्॥

॥ इति श्री जन्माष्टमी व्रत कथा सम्पूर्ण ॥

Benefits (फल)

  • Complete Janmashtami vrat katha with Krishna's divine birth story from Bhagavata Purana
  • Fasting until midnight and celebrating Krishna's birth grants supreme devotion
  • Protects devotees from all dangers — as Krishna was protected from Kansa
  • Bestows spiritual growth, liberation, and Krishna's eternal grace
  • Essential katha for Janmashtami observance with complete vrat vidhi
  • Includes powerful Krishna mantras for daily recitation and meditation

Frequently Asked Questions

Common questions about Janmashtami Vrat Katha

Read Janmashtami Vrat Katha in Hindi with complete Krishna birth story and vrat vidhi. Sacred katha for devotion, protection, and spiritual growth. It is dedicated to Shree Krishna (श्री कृष्ण), the eighth avatar of vishnu. divine teacher of the bhagavad gita and embodiment of love. This sacred hymn contains 24 verses and is sourced from Bhagavata Purana.