Navratri Vrat Katha
नवरात्रि व्रत कथा
About Navratri Vrat Katha
Navratri Vrat Katha (नवरात्रि व्रत कथा) is a sacred prayer dedicated to Goddess Durga. This revered text originates from Devi Bhagavata Purana. It narrates the epic battle between Goddess Durga and the demon Mahishasura across nine nights, culminating in his defeat on Vijaya Dashami. Chanting this katha with devotion grants divine protection, victory over enemies, and invokes the blessings of all nine forms of the Goddess. Recitation is particularly auspicious during Navratri, Chaitra Navratri, and Dussehra. Comprising 22 verses with a reading time of about 15 minutes, this katha is essential for Navratri observance and devotional worship. On this page, you can read the complete Navratri Vrat Katha in Devanagari Sanskrit with English transliteration, Hindi meaning (arth), and free PDF download for offline recitation.
Reviewed & translated by Acharya Pushyadant Mishra
Stotra Path (स्तोत्र पाठ)
॥ श्री नवरात्रि व्रत कथा ॥
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे।
॥ नवरात्रि माहात्म्य ॥
नवरात्रि का पावन पर्व वर्ष में दो बार — चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से नवमी तक और आश्विन शुक्ल प्रतिपदा से नवमी तक — मनाया जाता है। नौ रात्रि तक माँ दुर्गा के नौ रूपों की पूजा-अर्चना की जाती है। यह कथा देवी भागवत पुराण में वर्णित है।
॥ कथा प्रारम्भ — महिषासुर का अत्याचार ॥
बहुत प्राचीन काल की बात है। महिषासुर नामक एक भयंकर दैत्य था। उसने ब्रह्माजी की कठोर तपस्या करके एक अद्भुत वरदान प्राप्त किया — "कोई भी देवता, दानव या पुरुष मुझे मार नहीं सकेगा।" इस वरदान से महिषासुर का अभिमान आकाश छूने लगा। उसने सोचा कि अब मुझे कोई पराजित नहीं कर सकता।
महिषासुर ने अपनी विशाल सेना लेकर स्वर्गलोक पर आक्रमण किया। इन्द्र और सभी देवताओं से भीषण युद्ध हुआ। किन्तु महिषासुर के वरदान के कारण कोई भी देवता उसे पराजित नहीं कर सका। इन्द्र को स्वर्ग छोड़ना पड़ा। महिषासुर ने स्वर्ग पर अधिकार कर लिया।
देवताओं को पृथ्वी पर भटकना पड़ा। महिषासुर ने ऋषि-मुनियों के आश्रम उजाड़ दिये, यज्ञों को नष्ट किया, प्रजा पर अत्याचार करने लगा। तीनों लोकों में हाहाकार मच गया।
॥ देवी दुर्गा का प्राकट्य ॥
सभी देवता दुःखी होकर ब्रह्मा, विष्णु और महेश के पास गये। उन्होंने कहा — "हे प्रभु! महिषासुर को कोई पुरुष नहीं मार सकता, अतः अब क्या करें?"
तब त्रिदेव — ब्रह्मा, विष्णु और शिव — ने अपनी-अपनी शक्तियों को एक किया। सभी देवताओं के शरीर से दिव्य तेज निकला। वह तेज एक स्थान पर एकत्र होकर एक अत्यन्त भव्य और दिव्य स्त्री रूप में प्रकट हुआ। वह साक्षात् आदिशक्ति माँ दुर्गा थीं।
देवी की दस भुजाएँ थीं। उनका मुख चन्द्रमा के समान कान्तिमान था। प्रत्येक देवता ने उन्हें अपना-अपना शस्त्र प्रदान किया — शिव ने त्रिशूल दिया, विष्णु ने चक्र, ब्रह्मा ने कमण्डल और वेद, इन्द्र ने वज्र, वरुण ने शंख, अग्निदेव ने शक्ति (भाला), वायुदेव ने धनुष-बाण, सूर्यदेव ने तीक्ष्ण किरणें, काल ने खड्ग और ढाल, विश्वकर्मा ने फरसा दिया। हिमालय ने वाहन के लिये सिंह प्रदान किया।
देवी दुर्गा सिंह पर सवार होकर युद्धभूमि में गयीं।
॥ नौ रात्रि का महासंग्राम ॥
महिषासुर ने जब देवी को देखा तो पहले उपहास किया — "एक स्त्री मुझसे युद्ध करेगी?" किन्तु जब देवी ने अपनी सेना का संहार आरम्भ किया, तब महिषासुर भयभीत हुआ।
नौ रात्रि तक भीषण युद्ध चला। प्रतिदिन देवी ने अपना एक-एक रूप धारण किया — शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चन्द्रघण्टा, कूष्माण्डा, स्कन्दमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी और सिद्धिदात्री। प्रत्येक रूप में उन्होंने महिषासुर की सेना के एक-एक प्रमुख दानव का वध किया।
महिषासुर बार-बार रूप बदलता — कभी भैंसा, कभी सिंह, कभी हाथी, कभी मनुष्य। किन्तु देवी प्रत्येक रूप को पराजित करती गयीं।
॥ विजयादशमी — दशमी दिवस की विजय ॥
दसवें दिन — विजया दशमी को — जब महिषासुर ने भैंसे का रूप धारण किया, तब माँ दुर्गा ने अपना पैर उसकी गर्दन पर रखा और त्रिशूल से उसका वध कर दिया। तीनों लोकों में जय-जयकार हुआ। देवताओं ने आकाश से पुष्प वर्षा की। स्वर्ग पुनः देवताओं को प्राप्त हुआ।
तभी से नौ रात्रि तक देवी के नौ रूपों की पूजा और दसवें दिन विजया दशमी (दशहरा) का उत्सव मनाया जाता है।
॥ नौ दिन — नौ रूप ॥
प्रथम — शैलपुत्री (पर्वतराज हिमालय की पुत्री)
द्वितीय — ब्रह्मचारिणी (तप और ज्ञान की देवी)
तृतीय — चन्द्रघण्टा (शौर्य और सौन्दर्य)
चतुर्थ — कूष्माण्डा (सृष्टि की उत्पत्ति)
पञ्चम — स्कन्दमाता (कार्तिकेय की माता)
षष्ठम — कात्यायनी (महिषासुर मर्दिनी)
सप्तम — कालरात्रि (काल का विनाश)
अष्टम — महागौरी (शान्ति और करुणा)
नवम — सिद्धिदात्री (सर्व सिद्धि प्रदायिनी)
॥ व्रत विधि ॥
प्रतिपदा से नवमी तक नौ दिन व्रत रखें।
प्रतिदिन माँ दुर्गा के उस दिन के रूप की पूजा करें।
नवमी को कन्या पूजन (कुमारी पूजा) करें — नौ कन्याओं को भोजन कराएँ।
दशमी को विजयोत्सव मनायें।
सम्पूर्ण दुर्गा सप्तशती या देवी कवच का पाठ करें।
॥ मन्त्र ॥
सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके।
शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते॥
या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥
॥ इति श्री नवरात्रि व्रत कथा सम्पूर्ण ॥
Benefits (फल)
- ★Complete Navratri vrat katha with Mahishasur vadh and nine forms of Durga
- ★Grants divine protection from all enemies and evil forces
- ★Bestows victory, courage, and strength to overcome all challenges
- ★Invokes the combined blessings of Durga, Lakshmi, and Saraswati
- ★Essential reading during both Chaitra and Sharad Navratri observance
- ★Recitation with devotion leads to spiritual growth and liberation
