Tulsi Vivah Katha
तुलसी विवाह कथा
About Tulsi Vivah Katha
Tulsi Vivah Katha (तुलसी विवाह कथा) is a sacred prayer dedicated to Lord Vishnu. This revered text originates from the Padma Purana. Reciting this katha with devotion grants marital bliss, pleases Lord Vishnu through Tulsi worship, and ensures prosperity and dharmic life. Recitation is particularly auspicious during Tulsi Vivah and Devuthani Ekadashi. Comprising 14 verses, it can be completed in approximately 12 minutes, making it ideal for festival day worship. On this page, you can read the complete Tulsi Vivah Katha in Devanagari Sanskrit with English transliteration, Hindi meaning (arth), and free PDF download for offline recitation.
Reviewed & translated by Acharya Pushyadant Mishra
Stotra Path (स्तोत्र पाठ)
॥ श्री तुलसी विवाह कथा ॥
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।
॥ कथा ॥
बहुत प्राचीन समय की बात है। समुद्र मन्थन से उत्पन्न असुरों में जालन्धर नाम का एक अत्यन्त शक्तिशाली दैत्य था। उसकी पत्नी का नाम वृन्दा था। वृन्दा परम पतिव्रता और धर्मपरायण स्त्री थी। उसके पातिव्रत्य धर्म का तेज इतना प्रचण्ड था कि उसके कारण जालन्धर को कोई भी देवता, दानव या मनुष्य पराजित नहीं कर सकता था।
जालन्धर के अत्याचार बढ़ते गए। उसने तीनों लोकों को जीत लिया। देवताओं को स्वर्ग से निकाल दिया। इन्द्र, वरुण, अग्नि — सब पराजित हो गए। यहाँ तक कि भगवान शिव भी जालन्धर को नहीं मार पा रहे थे क्योंकि वृन्दा का पातिव्रत्य उसकी ढाल बना हुआ था।
सब देवताओं ने भगवान विष्णु से प्रार्थना की — "हे प्रभु! जब तक वृन्दा का पातिव्रत्य अखण्ड है, तब तक जालन्धर अमर है। कोई उपाय कीजिए।"
भगवान विष्णु ने सृष्टि की रक्षा के लिए एक कठिन निर्णय लिया। जब जालन्धर शिवजी से युद्ध कर रहा था, तब भगवान विष्णु ने जालन्धर का रूप धारण किया और वृन्दा के पास गए। वृन्दा ने उन्हें अपना पति समझकर स्वागत किया।
किन्तु कुछ समय बाद वृन्दा को दिव्य दृष्टि से ज्ञात हो गया कि यह उसका पति जालन्धर नहीं, बल्कि भगवान विष्णु हैं। उसका पातिव्रत्य खण्डित हो चुका था। उसी क्षण शिवजी ने जालन्धर का वध कर दिया।
वृन्दा क्रोध और दुःख से भर गई। उसने भगवान विष्णु को श्राप दिया — "हे विष्णु! तुमने छल से मेरा सतीत्व भंग किया। मैं तुम्हें श्राप देती हूँ कि तुम पत्थर बन जाओगे!"
भगवान विष्णु ने वृन्दा के श्राप को स्वीकार किया और कहा — "हे वृन्दा! तुम्हारा श्राप मुझे स्वीकार है। मैं शालिग्राम शिला के रूप में पूजा जाऊँगा। किन्तु मैं तुम्हें भी वरदान देता हूँ — तुम तुलसी के पवित्र पौधे के रूप में धरती पर अवतरित होगी। तुम्हारे बिना मेरी कोई भी पूजा पूर्ण नहीं होगी। तुलसी दल के बिना विष्णु का भोग स्वीकार नहीं होगा। तुम सदैव मेरे समीप रहोगी।"
वृन्दा ने अग्नि में प्रवेश किया और उसी स्थान पर तुलसी का पौधा उत्पन्न हुआ। तभी से तुलसी को भगवान विष्णु की प्रिय मानी जाती है और प्रत्येक हिन्दू घर में तुलसी का पौधा लगाया जाता है।
कार्तिक शुक्ल एकादशी (देवउठनी एकादशी) को जब भगवान विष्णु योगनिद्रा से जागते हैं, उस दिन तुलसी का विवाह शालिग्राम से कराया जाता है। यह विवाह पूर्ण वैदिक विधि-विधान से होता है — मण्डप सजाया जाता है, तुलसी के पौधे को दुल्हन की तरह श्रृंगार किया जाता है, शालिग्राम को दूल्हे के रूप में सजाया जाता है। सात फेरे होते हैं, मन्त्रोच्चारण होता है।
तुलसी विवाह के बाद हिन्दू विवाह का मौसम प्रारम्भ होता है। चातुर्मास में जो सब शुभ कार्य रुके थे, वे सब पुनः आरम्भ हो जाते हैं।
॥ व्रत विधि ॥
कार्तिक शुक्ल एकादशी को तुलसी के पौधे को स्नान कराएँ और श्रृंगार करें।
शालिग्राम की मूर्ति स्थापित करें।
गन्ने का मण्डप बनाएँ, आम के पत्तों से सजाएँ।
विवाह की विधि से सात फेरे कराएँ।
कथा श्रवण करें, आरती करें और प्रसाद वितरित करें।
॥ मन्त्र ॥
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।
तुलस्यमृतजन्मासि सदा त्वं केशवप्रिये।
केशवार्थे चिनोमि त्वां वरदा भव शोभने॥
॥ इति श्री तुलसी विवाह कथा सम्पूर्ण ॥
Benefits (फल)
- ★Tulsi Vivah marks the beginning of the Hindu wedding season
- ★Grants marital bliss and blessings for a happy married life
- ★Tulsi worship daily pleases Lord Vishnu and removes sins
- ★Observing this katha ensures prosperity and dharmic life
- ★Deepens devotion to Vishnu through understanding of Tulsi's sacred origin
