Ekadashi Vrat Katha
एकादशी व्रत कथा
About Ekadashi Vrat Katha
The Ekadashi Vrat Katha, known in Sanskrit as एकादशी व्रत कथा, is a sacred prayer in praise of Lord Vishnu. Rooted in Padma Purana, this composition carries deep spiritual significance. Devotees recite this prayer to free ancestors from bondage (pitru dosh shanti) and uplift the entire family and grant health, wealth, progeny, and ultimately Vaikuntha (Vishnu's divine abode). It is also said to destroy all sins and grant liberation (moksha) through Vishnu's grace. Recitation is particularly auspicious during Nirjala Ekadashi, Devshayani Ekadashi, and Devuthani Ekadashi. At 18 verses long, the recitation takes roughly 10 minutes, making it accessible for regular devotional use. On this page, you can read the complete Ekadashi Vrat Katha in Devanagari Sanskrit with English transliteration, Hindi meaning (arth), and free PDF download for offline recitation.
Reviewed & translated by Acharya Pushyadant Mishra
Stotra Path (स्तोत्र पाठ)
॥ श्री एकादशी व्रत कथा ॥
॥ पद्म पुराण अनुसार ॥
॥ एकादशी माहात्म्य ॥
युधिष्ठिर बोले — हे भगवन्! एकादशी व्रत का क्या माहात्म्य है? इसकी उत्पत्ति कैसे हुई? कृपया मुझे विस्तार से बताइये।
श्रीकृष्ण बोले — हे राजन्! एकादशी की उत्पत्ति की कथा सुनो।
॥ कथा प्रारम्भ — एकादशी की उत्पत्ति ॥
सत्ययुग में मुर नामक एक भयंकर दैत्य था। उसने देवताओं को पराजित कर स्वर्ग पर अधिकार कर लिया। सभी देवता भयभीत होकर भगवान विष्णु की शरण में गये।
भगवान विष्णु ने मुर दैत्य से युद्ध किया। वह युद्ध बहुत दिनों तक चला। एक समय भगवान विष्णु बद्रिकाश्रम की एक गुफा में विश्राम कर रहे थे। मुर दैत्य ने उन्हें सोते हुए देखकर मारना चाहा।
तभी भगवान विष्णु के शरीर से एक दिव्य कन्या प्रकट हुई। वह अत्यन्त तेजस्वी और शक्तिशाली थी। उसने मुर दैत्य से भीषण युद्ध किया और उसका वध कर दिया।
जब भगवान विष्णु जागे तो उन्होंने मुर दैत्य को मृत देखा। प्रसन्न होकर उन्होंने उस कन्या से कहा — "हे देवी! तुमने मेरे लिए मुर दैत्य का वध किया, अतः तुम 'एकादशी' नाम से विख्यात होओगी। जो मनुष्य तुम्हारे दिन (एकादशी तिथि) को व्रत करेगा, उसके सब पाप नष्ट होंगे और उसे मोक्ष प्राप्त होगा।"
तभी से एकादशी तिथि को भगवान विष्णु का व्रत करने की परम्परा प्रचलित हुई।
॥ एकादशी व्रत विधि ॥
दशमी के दिन सात्विक भोजन करें, रात्रि में शीघ्र सो जायें।
एकादशी के दिन ब्रह्ममुहूर्त में उठकर स्नान करें।
संकल्प लें — "मम सर्वपापक्षयपूर्वकं श्रीहरिप्रीतये एकादशीव्रतमहं करिष्ये।"
भगवान विष्णु का पूजन करें — तुलसी, पुष्प, चन्दन, धूप, दीप, नैवेद्य से।
निराहार व्रत रखें। जल भी न पियें तो उत्तम, अन्यथा जल या फलाहार।
रात्रि जागरण करें — भगवत् कथा, कीर्तन, नाम-जप में लगे रहें।
द्वादशी के दिन प्रातः स्नान-पूजन कर ब्राह्मण भोजन कराकर व्रत का पारण करें।
॥ एकादशी का महत्त्व ॥
भगवान कृष्ण ने कहा — हे अर्जुन! जो मनुष्य एकादशी का व्रत नहीं करता, वह महापापी है। एकादशी व्रत से पितरों को मुक्ति मिलती है, कुल का उद्धार होता है।
गंगा स्नान, काशी निवास, सूर्य ग्रहण दान — इन सबका फल एकादशी व्रत से प्राप्त होता है।
शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष — दोनों एकादशी करनी चाहिये।
"एकादश्यां न भुञ्जीत पक्षयोरुभयोरपि।"
विष्णु सहस्रनाम का पाठ, गीता पाठ, हरि कीर्तन — एकादशी के दिन ये सब पुण्यप्रद हैं।
॥ फल ॥
सर्व पाप नाश और मोक्ष प्राप्ति।
पितृ दोष शान्ति और कुल का उद्धार।
धन, स्वास्थ्य, सन्तान सुख की प्राप्ति।
भगवान विष्णु की परम कृपा।
वैकुण्ठ धाम की प्राप्ति।
॥ इति श्री एकादशी व्रत कथा सम्पूर्ण ॥
Benefits (फल)
- ★Origin story of Ekadashi from Padma Purana — most important Vaishnava fast
- ★Destroys all sins and grants liberation (moksha) through Vishnu's grace
- ★Frees ancestors from bondage (pitru dosh shanti) and uplifts the entire family
- ★Observed twice a month (Shukla and Krishna Paksha) — 24 Ekadashis per year
- ★Grants health, wealth, progeny, and ultimately Vaikuntha (Vishnu's divine abode)
- ★Especially powerful when combined with Vishnu Sahasranama and Gita recitation
