Shree Parvati — the gentle goddess of fertility, love, and devotionShree Parvati

Vat Savitri Vrat Katha

वट सावित्री व्रत कथा

15 min read25 versesSource: Mahabharata - Vana Parva

About Vat Savitri Vrat Katha

Vat Savitri Vrat Katha (वट सावित्री व्रत कथा) is a sacred prayer dedicated to Goddess Parvati and Lord Vishnu. Attributed to Mahabharata - Vana Parva, this prayer narrates the immortal story of Savitri who followed Yama and won back her husband Satyavan's life through devotion and wit. Devotees recite this katha for husband's long life, marital harmony, and saubhagya. Recitation is particularly auspicious during Vat Savitri (Jyeshtha Amavasya). With a reading time of about 15 minutes, this is one of the longest and most beloved vrat kathas in Hindu tradition. On this page, you can read the complete Vat Savitri Vrat Katha in Devanagari Hindi with English transliteration, Hindi meaning (arth), and free PDF download for offline recitation.

Reviewed & translated by Acharya Pushyadant Mishra

Stotra Path (स्तोत्र पाठ)

॥ श्री वट सावित्री व्रत कथा ॥

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय। ॐ उमायै नमः।

॥ माहात्म्य ॥

ज्येष्ठ मास की अमावस्या को वट सावित्री व्रत किया जाता है। सुहागिन स्त्रियाँ वट वृक्ष (बरगद) की पूजा करती हैं और पति की दीर्घायु तथा सौभाग्य की कामना करती हैं। यह व्रत सती सावित्री की अमर प्रेमगाथा पर आधारित है।

॥ कथा ॥

प्राचीन काल में मद्र देश के राजा अश्वपति थे। वे बहुत धर्मात्मा थे किन्तु उनकी कोई सन्तान नहीं थी। उन्होंने सावित्री देवी की तपस्या की। प्रसन्न होकर सावित्री देवी ने उन्हें एक कन्या का वरदान दिया। उस कन्या का नाम सावित्री रखा गया।

सावित्री बड़ी होकर अत्यन्त सुन्दर और विदुषी हुई। जब विवाह का समय आया तो राजा ने कहा — "पुत्री, तुम स्वयं अपना वर चुन लो।" सावित्री वनों में घूमती हुई शाल्व देश के अन्धे राजा द्युमत्सेन के पुत्र सत्यवान से मिली। सत्यवान वन में पिता की सेवा करता हुआ तपस्वी जीवन जीता था।

सावित्री ने लौटकर पिता से कहा — "पिताजी, मैंने सत्यवान को पति रूप में चुना है।"

नारद मुनि वहाँ उपस्थित थे। उन्होंने कहा — "राजन्! सत्यवान गुणवान है किन्तु उसकी आयु केवल एक वर्ष शेष है। ठीक एक वर्ष बाद उसकी मृत्यु निश्चित है।"

सावित्री बोलीं — "मैंने मन से सत्यवान को पति स्वीकार कर लिया है। जो होना है वह होगा, किन्तु मैं अपना निश्चय नहीं बदलूँगी।"

विवाह हो गया। सावित्री वन में सास-ससुर की सेवा करने लगी। वह दिन गिनती रहती — एक-एक दिन बीतता गया।

जब अन्तिम दिन आया, सावित्री ने तीन दिन पहले से निर्जला व्रत रखा। उस दिन सत्यवान लकड़ी काटने वन में गया। सावित्री भी साथ गई।

सत्यवान एक वट वृक्ष पर चढ़कर लकड़ी काट रहा था। अचानक उसके सिर में तीव्र पीड़ा हुई और वह वृक्ष से नीचे गिर पड़ा। सावित्री ने उसका सिर अपनी गोद में रख लिया।

तभी यमराज स्वयं प्रकट हुए। उन्होंने पाश से सत्यवान के प्राण खींच लिए और दक्षिण दिशा की ओर चल पड़े।

सावित्री यमराज के पीछे-पीछे चलने लगी।

यमराज बोले — "हे सावित्री! लौट जाओ। तुम्हारा पति का शरीर वहीं है, उसका अन्तिम संस्कार करो।"

सावित्री बोली — "जहाँ मेरे पति के प्राण जाएँगे, वहीं मैं भी जाऊँगी। पतिव्रता स्त्री कभी पति का साथ नहीं छोड़ती।"

यमराज प्रसन्न हुए — "तुम्हारी भक्ति और वचन-चातुर्य से मैं प्रसन्न हूँ। सत्यवान के प्राणों के अतिरिक्त कोई भी वर माँगो।"

सावित्री बोली — "मेरे ससुर की आँखों की ज्योति लौटा दीजिए।"

यमराज ने कहा — "तथास्तु! अब लौट जाओ।"

सावित्री नहीं रुकी, चलती रही। यमराज ने फिर वर माँगने को कहा।

सावित्री बोली — "मेरे ससुर का राज्य वापस दिलवा दीजिए।"

"तथास्तु!"

सावित्री फिर भी पीछे चलती रही। यमराज ने तीसरा वर माँगने को कहा।

सावित्री बोली — "मेरे पिता को सौ पुत्रों का वरदान दीजिए।"

"तथास्तु! अब तो लौट जाओ।"

सावित्री बोली — "मुझे भी सौ पुत्रों की माता होने का वरदान दीजिए।"

यमराज बोले — "तथास्तु!" — और फिर चौंके। बोले — "हे सावित्री! तुम पतिव्रता हो। सौ पुत्रों की माता तभी बन सकती हो जब तुम्हारा पति जीवित हो। तुमने अपनी बुद्धिमत्ता से मुझे बाँध लिया।"

यमराज ने प्रसन्न होकर सत्यवान के प्राण लौटा दिए।

सावित्री वट वृक्ष के पास लौटी। सत्यवान जीवित हो उठा। दोनों घर लौटे — ससुर की आँखें ठीक हो गईं, राज्य वापस मिला, सब मंगल हुआ।

तभी से सुहागिन स्त्रियाँ ज्येष्ठ अमावस्या को वट वृक्ष की परिक्रमा करती हैं, कच्चे सूत लपेटती हैं और पति की दीर्घायु की कामना करती हैं।

॥ व्रत विधि ॥

ज्येष्ठ अमावस्या को निर्जला या एकाहार व्रत रखें।

वट वृक्ष (बरगद) के नीचे शिव-पार्वती-सावित्री का पूजन करें।

वट वृक्ष की सात परिक्रमा करें और कच्चा सूत लपेटें।

कथा सुनें और प्रसाद बाँटें।

सौभाग्य चिन्ह धारण करें।

॥ इति श्री वट सावित्री व्रत कथा सम्पूर्णा ॥

Benefits (फल)

  • Most powerful vrat for husband's long life — based on Savitri's victory over Yama
  • Celebrated on Jyeshtha Amavasya by married women across India
  • Worshipping the Banyan (Vat) tree bestows marital longevity and saubhagya
  • Savitri's story teaches the power of devotion, wit and unwavering love
  • Seven parikramas of the Vat tree with sacred thread is the core ritual
  • One of the three great saubhagya vrats along with Karva Chauth and Teej

Frequently Asked Questions

Common questions about Vat Savitri Vrat Katha

Vat Savitri Vrat Katha in Hindi — complete story of Savitri and Satyavan from Mahabharata. For husband's long life and saubhagya. It is dedicated to Shree Parvati (श्री पार्वती), the gentle goddess of fertility, love, and devotion. consort of lord shiva and mother of ganesha and kartikeya. This sacred hymn contains 25 verses and is sourced from Mahabharata - Vana Parva.