Makar Sankranti Vrat Katha
मकर संक्रांति व्रत कथा
About Makar Sankranti Vrat Katha
Makar Sankranti Vrat Katha (मकर संक्रांति व्रत कथा) is a sacred prayer dedicated to Lord Surya. This revered text originates from the Surya Purana. Chanting this katha with devotion is said to please Surya Dev and remove health ailments, pacify Shani dosha, and bring prosperity through til-gur daan. Recitation is particularly auspicious on Sunday (Ravivar) and during Makar Sankranti. Comprising 12 verses, it can be completed in approximately 10 minutes, making it suitable for festival day recitation. On this page, you can read the complete Makar Sankranti Vrat Katha in Devanagari Sanskrit with English transliteration, Hindi meaning (arth), and free PDF download for offline recitation.
Reviewed & translated by Acharya Pushyadant Mishra
Stotra Path (स्तोत्र पाठ)
॥ श्री मकर संक्रांति व्रत कथा ॥
ॐ श्री सूर्यदेवाय नमः।
॥ कथा ॥
बहुत पुराने समय की बात है। सूर्यदेव अपने तेज से सारे संसार को प्रकाशित करते थे, किन्तु उनके अपने पुत्र शनिदेव से उनका सम्बन्ध अत्यन्त कटु था। शनिदेव की माता छाया ने उन्हें जन्म दिया था। सूर्यदेव छाया और शनि दोनों से रुष्ट रहते थे।
शनिदेव के बारे में यह प्रसिद्ध था कि उनकी दृष्टि अत्यन्त भयंकर है — जिस पर भी उनकी नज़र पड़ जाए, उसका अनिष्ट हो जाता है। इसी कारण सूर्यदेव शनि से दूर रहते थे और पिता-पुत्र में बरसों से बातचीत तक नहीं होती थी।
शनिदेव इस बात से बहुत दुखी थे। वे अपने पिता से प्रेम करते थे, किन्तु पिता उनसे मिलना ही नहीं चाहते थे। शनिदेव ने मन ही मन प्रार्थना की कि एक बार पिताजी मेरे घर आ जाएँ तो मैं उनकी सेवा करके उन्हें प्रसन्न करूँ।
मकर संक्रांति का पवित्र दिन आया। इस दिन सूर्यदेव मकर राशि में प्रवेश करते हैं। सूर्यदेव ने सोचा कि वर्षों से मैंने अपने पुत्र को नहीं देखा, आज उसके घर जाकर उसका हाल जानना चाहिए। पिता का हृदय पिघल गया और वे शनिदेव के निवास की ओर चल पड़े।
शनिदेव को जब पता चला कि उनके पिता सूर्यदेव स्वयं उनके घर पधार रहे हैं तो उनकी आँखों में आँसू आ गए। उन्होंने अपना घर साफ किया, द्वार पर रंगोली बनाई और पिता के स्वागत की तैयारी की।
सूर्यदेव जब शनिदेव के घर पहुँचे तो शनि ने उनके चरण छुए। सूर्यदेव ने पुत्र को हृदय से लगा लिया। शनिदेव ने अपने पिता के लिये तिल और गुड़ से बने पकवान परोसे। तिल और गुड़ शनिदेव को अत्यन्त प्रिय हैं।
सूर्यदेव ने तिल-गुड़ के लड्डू खाए, गुड़ की चाशनी पी और पुत्र की सेवा से अत्यन्त प्रसन्न हुए। उन्होंने कहा — "पुत्र! तुमने तिल और गुड़ से मेरा आतिथ्य किया, आज से जो भी मनुष्य मकर संक्रांति के दिन तिल और गुड़ का सेवन करेगा, दान करेगा और सूर्य की उपासना करेगा, उसे स्वास्थ्य, धन और सुख की प्राप्ति होगी।"
शनिदेव ने भी प्रसन्न होकर कहा — "जो मनुष्य इस दिन तिल का दान करेगा और पतंग उड़ाकर सूर्यदेव की किरणों का सेवन करेगा, उस पर मेरी कुदृष्टि कभी नहीं पड़ेगी और शनि का प्रकोप शान्त होगा।"
तभी से मकर संक्रांति का पर्व मनाया जाता है। लोग तिल-गुड़ खाते हैं, तिल-गुड़ बाँटते हैं और कहते हैं — "तिल-गुड़ घ्या, गोड गोड बोला" अर्थात् तिल-गुड़ लो और मीठा-मीठा बोलो। पतंगें उड़ाई जाती हैं ताकि शरीर को सूर्य की किरणें मिलें। गंगा और पवित्र नदियों में स्नान किया जाता है। गरीबों को तिल, कम्बल और अन्न का दान दिया जाता है।
॥ व्रत विधि ॥
मकर संक्रांति के दिन प्रातःकाल पवित्र नदी या घर में गंगाजल से स्नान करें।
सूर्यदेव को जल का अर्घ्य दें — जल में तिल, लाल पुष्प और रोली डालें।
तिल और गुड़ के लड्डू का भोग लगाएँ।
ब्राह्मणों और गरीबों को तिल, गुड़, कम्बल, खिचड़ी आदि का दान करें।
कथा श्रवण करें और सूर्यदेव की आरती करें।
॥ मन्त्र ॥
ॐ ह्रां ह्रीं ह्रौं सः सूर्याय नमः।
॥ इति श्री मकर संक्रांति व्रत कथा सम्पूर्ण ॥
Benefits (फल)
- ★Pleases Surya Dev and removes health ailments
- ★Pacifies Shani dosha and protects from malefic Saturn effects
- ★Brings prosperity and abundance through til-gur daan
- ★Strengthens family bonds and heals broken relationships
- ★Sacred bathing and charity on this day yield manifold punya
